Incest Doctor माँ

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शहर के एक पॉश इलाके में एक छोटा लेकिन बहुत ही सलीके से सजा हुआ प्राइवेट क्लिनिक है। बाहर बोर्ड पर लिखा है— “डॉ. अंजलि शर्मा, एम.डी. (General Physician)”।

अंजलि की उम्र 42 साल है, लेकिन उसे देखकर कोई कह नहीं सकता। योग और अनुशासन ने उसके शरीर को एक तराशा हुआ रूप दिया है। उसकी त्वचा अभी भी मखमली है, और जब वह सफेद एप्रन पहनती है, तो उसकी शख्सियत में एक अजीब सा आकर्षण और अधिकार (Authority) झलकता है। वह एक डॉक्टर होने के साथ-साथ एक माँ भी है, जो अपने घर और करियर को अकेले संभाल रही है।

उसका पति, जो विदेश में एक बड़ा कॉन्ट्रैक्टर है, साल में मुश्किल से एक या दो बार ही घर आता है। पैसों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अंजलि के बिस्तर में पिछले कई सालों से एक ठंडी खामोशी पसरी हुई है। एक जवान और खूबसूरत औरत के शरीर की ज़रूरतें अक्सर उसके डॉक्टर वाले एप्रन के नीचे दबी रह जाती हैं।

उसका बेटा, आर्यन, अब 19 साल का हो चुका है। वह कॉलेज में है और दिखने में बिल्कुल अपने पिता जैसा गठीला और लंबा है। आर्यन अक्सर अपनी माँ के क्लिनिक पर हाथ बटाने या बस वक्त बिताने चला आता है।

दोपहर के दो बज रहे हैं। क्लिनिक में आखिरी मरीज जा चुका है। बाहर धूप तेज़ है और क्लिनिक के अंदर एसी की ठंडी हवा एक अजीब सा सुकून दे रही है। अंजलि अपनी केबिन में बैठी कुछ फाइल्स देख रही है। सफेद शर्ट के ऊपर डॉक्टर का कोट है, और उसने अपने बालों को एक जूड़े में बांध रखा है जिससे उसकी लंबी और गोरी गर्दन साफ चमक रही है।

तभी केबिन का दरवाज़ा धीरे से खुलता है और आर्यन अंदर कदम रखता है। क्लिनिक अब पूरी तरह खाली है, सिर्फ माँ और बेटा इस ठंडे और शांत माहौल में अकेले हैं।

आर्यन केबिन के अंदर आता है और अपनी माँ के सामने वाली कुर्सी पर आराम से धंस जाता है। अंजलि अपनी फाइलें एक तरफ रखती है और चश्मा उतारकर अपनी मेज पर रख देती है। उसकी आँखों में थकावट तो है, लेकिन बेटे को देखकर एक सुकून भरी चमक आ जाती है।

“बड़ी देर कर दी आज? कॉलेज में कोई एक्स्ट्रा क्लास थी या फिर दोस्तों के साथ कहीं निकल गया था?” अंजलि ने अपनी कुर्सी के पीछे टेक लगाते हुए पूछा।

आर्यन मुस्कुराया, “नहीं माँ, बस वो प्रोजेक्ट सबमिट करना था। और वैसे भी, बाहर इतनी गर्मी है कि कहीं जाने का मन ही नहीं हुआ। सोचा आपके साथ ही घर चलूँगा।”

अंजलि ने घंटी बजाकर अपने अटेंडेंट को दो कप चाय लाने का इशारा किया। अगले कुछ मिनटों तक उनके बीच कॉलेज के प्रोफेसरों, असाइनमेंट के बोझ और आर्यन के दोस्तों की शरारतों पर बातें होती रहीं। अंजलि एक माँ की तरह उसकी बातें सुन रही थी, बीच-बीच में उसे टोकती और कभी-कभी उसकी किसी बात पर खिलखिलाकर हँस पड़ती।

बातों-बातों में ज़िक्र विदेश में बैठे आर्यन के पिता का चल पड़ा।

“आज पापा का फोन आया था सुबह,” अंजलि ने चाय का कप उठाते हुए कहा। “कह रहे थे कि इस बार कॉन्ट्रैक्ट कुछ ज़्यादा ही बड़ा मिल गया है। शायद दिवाली पर भी उनका आना मुश्किल हो।”

आर्यन के चेहरे पर थोड़ी मायूसी आई। “पापा हमेशा काम में ही उलझे रहते हैं। आपको नहीं लगता माँ कि उन्हें अब वापस आ जाना चाहिए? आखिर कब तक हम ऐसे अलग-अलग रहेंगे? आपको उनकी कमी महसूस नहीं होती?”

अंजलि चाय की चुस्की लेते हुए कुछ पल के लिए खामोश हो गई। उसकी नज़रें खिड़की से बाहर की धूप पर टिकी थीं। “बेटा, ज़िम्मेदारियाँ इंसान को बहुत दूर ले जाती हैं। कमी तो खलती है, पर अब आदत सी हो गई है। खैर, तू बता… शाम के खाने में क्या बनवाना है? आज तेरा मनपसंद मलाई कोफ्ता बनवाऊँ?”

आर्यन अपनी माँ के चेहरे को गौर से देख रहा था। उसे महसूस हुआ कि माँ की इस सादगी और मुस्कुराहट के पीछे एक अकेलापन है जिसे वो कभी ज़ाहिर नहीं होने देतीं। वे दोनों काफी देर तक खाने के मेनू, घर की साफ-सफाई और आने वाले संडे के प्लान्स पर चर्चा करते रहे।

पूरे क्लिनिक में सिर्फ उन दोनों की आवाज़ें गूँज रही थीं। कोई हड़बड़ी नहीं थी, बस एक लंबा और गहरा संवाद था जो माँ-बेटे के बीच के उस मज़बूत धागे को दिखा रहा था,

केबिन की खिड़की से बाहर का आसमान अब गहरा नारंगी होने लगा था। दिन भर की तपिश अब हल्की ठंडी हवा में बदल रही थी। अंजलि ने अपनी मेज पर रखी आखिरी फाइल बंद की और उसे दराज में रख दिया। उसने अपनी कलाई घड़ी देखी—साढ़े छह बज चुके थे।

“चलो आर्यन, अब निकलना चाहिए। आज वैसे भी क्लिनिक में काफी देर हो गई,” अंजलि ने उठते हुए कहा। उसने अपना सफेद डॉक्टर वाला एप्रन उतारा और उसे पीछे टंगे हैंगर पर बड़े करीने से टांग दिया। एप्रन हटने के बाद उसकी नीली रेशमी कुर्ती और सफेद ट्राउज़र उसके व्यक्तित्व को एक अलग ही कोमलता दे रहे थे।

आर्यन भी कुर्सी से उठा और अपना बैग कंधे पर लटका लिया। “हाँ माँ, चलिए। मुझे भी भूख लगने लगी है।”

अंजलि ने अपना हैंडबैग उठाया और एक बार कमरे का मुआयना किया कि कहीं कोई लाइट या एसी खुला तो नहीं रह गया। वह अपनी चीज़ों को लेकर हमेशा बहुत अनुशासित रहती थी। जब वे केबिन से बाहर निकले, तो गलियारे में हल्की छाया थी। अटेंडेंट पहले ही जा चुका था, इसलिए पूरा क्लिनिक अब सिर्फ उन दोनों के कदमों की आवाज़ से गूँज रहा था।

“आज तुम ड्राइव करोगे या मैं करूँ?” अंजलि ने क्लिनिक के मुख्य दरवाजे का ताला लगाते हुए पूछा। चाबियों का गुच्छा उसके हाथ में खनका, जिसकी आवाज़ उस शांत शाम में साफ सुनाई दी।

“मैं ही करूँगा माँ, आप थक गई होंगी दिन भर पेशेंट्स देख-देख कर,” आर्यन ने चाबियाँ अपनी ओर बढ़ाने का इशारा किया। अंजलि ने मुस्कुराते हुए चाबियाँ उसे थमा दीं।

वे दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरकर पार्किंग की ओर बढ़े। पार्किंग लॉट में अब सिर्फ अंजलि की सफेद सेडान खड़ी थी। शाम की हल्की रोशनी कार के कांच पर चमक रही थी। आसपास के पेड़ों से पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ें आ रही थीं।

गाड़ी के पास पहुँचकर आर्यन ने रिमोट से लॉक खोला। बीप-बीप की आवाज़ हुई। अंजलि पैसेंजर सीट की तरफ गई और अपना बैग पीछे वाली सीट पर रखा। गाड़ी के अंदर बैठने से पहले उसने एक बार गहरी सांस ली और ढलते सूरज को देखा।

“आज की शाम कितनी शांत है न, आर्यन?” उसने धीरे से कहा।

आर्यन ने ड्राइवर सीट पर बैठते हुए जवाब दिया, “हाँ माँ, बहुत। बस अब जल्दी घर पहुँचकर हाथ-मुँह धोकर चाय पीते हैं।”

अंजलि कार में बैठी और दरवाजा बंद किया। वह भारी दरवाजा बंद होने की आवाज़ उस खामोश पार्किंग में एक अंत की तरह गूँजी—जैसे आज का कामकाजी दिन खत्म हो गया हो। आर्यन ने इंजन स्टार्ट किया, हेडलाइट्स जलाईं और गाड़ी धीरे-धीरे क्लिनिक के गेट से बाहर निकलकर मुख्य सड़क की ओर बढ़ चली।

गाड़ी अब शहर की मुख्य सड़क पर थी, जहाँ शाम के ट्रैफिक की पीली लाइटें और शोर-शराबा शुरू हो गया था। केबिन के अंदर एक तरफ इंजन की दबी हुई आवाज़ थी और दूसरी तरफ एसी की हल्की सी सरसराहट। आर्यन का पूरा ध्यान सड़क पर था, और अंजलि बगल वाली सीट पर आराम से सिर टिकाए बाहर भागती रोशनी को देख रही थी।

“आर्यन…” अंजलि ने धीमे से चुप्पी तोड़ी, “मलाई कोफ्ता का तो तूने दोपहर में कहा था, पर मुझे लग रहा है कि साथ में कुछ ताज़ा सब्जियाँ भी होनी चाहिए। फ्रिज में तो बस वही दो-चार सूखी हुई भिंडियाँ पड़ी हैं।”

आर्यन ने गियर बदलते हुए हल्का सा सिर हिलाया, “माँ, आप जैसा कहो। वैसे भी बाहर का खाना खा-खा कर मैं बोर हो गया हूँ। आपके हाथ का बना सादा खाना ही बेस्ट होता है।”

अंजलि मुस्कुराई, “चापलूसी करना तो कोई तुझसे सीखे। अच्छा सुन, यहाँ से जो अगला मोड़ है, वहाँ से गाड़ी मार्केट की तरफ घुमा ले। पास ही में वो जो नया ‘मार्ट’ खुला है ना, वहीं चलते हैं। वहां सब्जियाँ एकदम फ्रेश मिल जाती हैं और थोड़ा घर का दूसरा राशन भी देखना है।”

आर्यन ने इंडिकेटर दिया और गाड़ी को मार्केट वाली लेन में डाल दिया। शाम का वक्त था, इसलिए बाज़ार में काफी चहल-पहल थी। लोग अपने थैले लिए इधर-उधर घूम रहे थे।

“माँ, आपको नहीं लगता कि आप दिन भर क्लिनिक में थकने के बाद ये सब काम खुद करके अपनी थकावट बढ़ा लेती हो?” आर्यन ने चिंता जताते हुए कहा, “आप मुझे लिस्ट दे दिया करो, मैं कॉलेज से आते वक्त ले आया करूँगा।”

अंजलि ने प्यार से आर्यन की तरफ देखा, “अरे बुद्धू, ये गृहस्थी के काम थकावट नहीं, बल्कि मन को सुकून देते हैं। दिन भर मरीज़ों की बीमारी और उनकी परेशानियों को सुनने के बाद, शाम को ताज़ा टमाटर और पालक चुनना मेरे लिए एक तरह की थेरेपी जैसा है। और फिर, तेरे साथ इसी बहाने थोड़ी और बातें भी तो हो जाती हैं।”

गाड़ी अब मार्ट की पार्किंग में पहुँच चुकी थी। आर्यन ने एक खाली जगह देखकर गाड़ी वहां सलीके से खड़ी कर दी। इंजन बंद होते ही एक पल के लिए केबिन में गहरा सन्नाटा छा गया।

“अच्छा चल, तू यहीं गाड़ी में बैठना चाहेगा या अंदर चलेगा मेरे साथ?” अंजलि ने अपना पर्स संभालते हुए पूछा।

आर्यन ने मुस्कुराकर दरवाजा खोला, “अकेले आपको इतने सारे थैले थोड़े ही उठाने दूँगा। चलिए, आज आपकी पसंद की सब्जियाँ मैं उठवाता हूँ।”

अंजलि अपनी सीट से उतरी और गाड़ी का दरवाज़ा बंद करते हुए बोली, “ठीक है, फिर जल्दी चल। वरना अच्छी सब्जियाँ तो लोग छाँट कर ले जाएँगे, हमारे हिस्से में बस डंठल ही बचेंगे।”

शाम की हल्की ढलती रोशनी में माँ-बेटा उस जगमगाते हुए मार्ट की ओर बढ़ गए। क्लिनिक की थकान अब धीरे-धीरे एक आम घरेलू शाम की व्यस्तता में बदल रही थी।

मार्ट के अंदर दाखिल होते ही ठंडी हवा और हल्की रोशनी ने उनका स्वागत किया। आर्यन ने बाहर से ही एक ट्रॉली खींच ली और अपनी माँ के पीछे-पीहार हो लिया। शाम का वक्त था, इसलिए मार्ट में काफी चहल-पहल थी, लेकिन अंजलि को इन सब की आदत थी। वह बहुत ही सलीके से गलियारों के बीच से रास्ता बनाते हुए सीधे ‘प्रोड्यूस सेक्शन’ (सब्जी विभाग) की ओर बढ़ी।

“आर्यन, तू वो बास्केट देख, और मैं जरा टमाटर चेक करती हूँ,” अंजलि ने कहा। वह एक-एक टमाटर को हाथ में उठाकर बड़े गौर से देख रही थी। एक डॉक्टर होने के नाते, साफ-सफाई और क्वालिटी को लेकर वह बहुत ज्यादा चूजी थी।

आर्यन ट्रॉली पकड़े खड़ा अपनी माँ को देख रहा था। अंजलि ने बड़े ध्यान से लाल और कड़क टमाटर छाँटकर एक थैली में डाले, फिर वह खीरे और ताजी हरी मिर्च की तरफ मुड़ गई। “देख, ये खीरे बिल्कुल ताजे हैं। सलाद के लिए अच्छे रहेंगे,” उसने एक खीरा आर्यन की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

आर्यन ने मुस्कुराकर उसे ट्रॉली में रख दिया। “माँ, आप तो जैसे लैब में रिसर्च कर रही हों, वैसे सब्जियाँ चुनती हो।”

अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी, “बेटा, अच्छी सेहत अच्छी रसोई से ही शुरू होती है। अगर सामान ही बासी होगा, तो खाने में वो स्वाद कहाँ आएगा?”

वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। अंजलि ने कुछ ताजी पालक की गड्डियां उठाईं और फिर अदरक-लहसुन के सेक्शन की ओर चली गई। आर्यन बीच-बीच में अपनी पसंद की कुछ चीजें, जैसे डार्क चॉकलेट का एक पैकेट और कुछ नट्स, चुपके से ट्रॉली में डाल देता, जिस पर अंजलि उसे तिरछी नज़र से देखकर मुस्कुरा देती।

“और कुछ रह गया माँ?” आर्यन ने पूछा जब वे राशन वाले गलियारे (Aisle) में पहुँचे।

“हाँ, थोड़ा आटा लेना है और शायद चायपत्ती खत्म होने वाली है,” अंजलि ने जवाब दिया। उन्होंने अगले पंद्रह-बीस मिनट बड़े ही इत्मीनान से घर की छोटी-मोटी जरूरतों का सामान इकट्ठा करने में बिताए। उनके बीच दालों के भाव, साबुन की खुशबू और घर के स्टॉक को लेकर काफी लंबी बातें हुईं। अंजलि को अच्छा लग रहा था कि उसका बेटा इन सब छोटे कामों में इतनी दिलचस्पी ले रहा है।

बिलिंग काउंटर पर काफी भीड़ थी, इसलिए उन्हें करीब दस मिनट इंतज़ार करना पड़ा। अंजलि ने अपना कार्ड निकाला, लेकिन आर्यन ने पहले ही अपना फोन निकाल लिया था। “माँ, आज ये मेरी तरफ से। पापा ने पिछले हफ्ते जो पैसे भेजे थे, वो अभी वैसे ही रखे हैं।”

अंजलि ने पहले तो मना करना चाहा, पर बेटे के चेहरे पर गर्व देखकर वह मान गई। “ठीक है, बड़े साहब। आज आपकी कमाई से ही घर चलेगा।”

सामान पैक होने के बाद, आर्यन ने दोनों भारी थैले अपने हाथों में उठा लिए। वे मार्ट के ऑटोमैटिक दरवाजों से बाहर निकले, जहाँ अब रात की ठंडक और स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी फैल चुकी थी। पार्किंग तक का रास्ता छोटा था, लेकिन आर्यन बड़े ध्यान से अपनी माँ के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा था ताकि उसे कोई धक्का न लगे।

गाड़ी के पास पहुँचकर आर्यन ने डिक्की (Boot) खोली और सामान को सलीके से अंदर रखा। अंजलि ने राहत की सांस ली और अपनी सीट की तरफ बढ़ी। “चलो, अब जल्दी घर चलते हैं। काम काफी हो गया आज,” उसने सीट बेल्ट लगाते हुए कहा।

आर्यन ने भी गाड़ी स्टार्ट की। मार्ट की भीड़ को पीछे छोड़ते हुए, उनकी सफेद सेडान अब रात के सन्नाटे में घर की ओर बढ़ने लगी।

गाड़ी मार्ट की पार्किंग से निकलकर मुख्य सड़क की ढलती हुई रोशनी में शामिल हो चुकी थी। रात का वक्त था और शहर की स्ट्रीट लाइट्स कार के डैशबोर्ड पर बारी-बारी से परछाइयां बना रही थीं। केबिन के अंदर एक बहुत ही आरामदायक और घरेलू सा माहौल था।

अंजलि ने सीट से थोड़ा पीछे झुककर अपनी आँखें मूंद लीं। दिन भर की थकान अब धीरे-धीरे शरीर पर भारी पड़ रही थी। आर्यन ने देखा कि माँ थोड़ी शांत हैं, तो उसने रेडियो की आवाज़ थोड़ी और कम कर दी।

“आज काफी सामान हो गया, है ना माँ?” आर्यन ने ट्रैफिक पर नज़र रखते हुए चुप्पी तोड़ी।

अंजलि ने आँखें खोलीं और उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई। “हाँ, और शुक्र है कि तुम साथ थे। वरना अकेले इतने भारी थैले उठाना और फिर गाड़ी चलाना… काफी मुश्किल हो जाता। सच कहूँ तो, अब मुझे महसूस होता है कि तुम वाकई बड़े हो गए हो।”

आर्यन थोड़ा शरमा गया। “बड़ा तो होना ही था माँ। आखिर कब तक आप सब कुछ अकेले संभालती रहेंगी? वैसे भी, पापा के बिना ये घर और क्लिनिक संभालना कोई छोटी बात नहीं है। मैं तो बस आपकी थोड़ी सी मदद कर देता हूँ।”

अंजलि कुछ पल के लिए खामोश रही, फिर उसने खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ों और दुकानों को देखते हुए कहा, “तुम्हारे पापा भी बहुत मेहनत कर रहे हैं वहां। कल फोन पर कह रहे थे कि वहां का प्रोजेक्ट अब अंतिम चरण में है। उन्हें अपनी मेहनत का फल मिल रहा है, लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि इस चक्कर में उन्होंने घर का बहुत सारा समय खो दिया है। तुम्हारी पूरी किशोरावस्था (Teenage) उन्होंने वीडियो कॉल पर ही देख ली।”

आर्यन ने गियर बदलते हुए जवाब दिया, “मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है माँ। मुझे पता है वो हमारे भविष्य के लिए ही वहां हैं। लेकिन हाँ, आपकी कमी को वो कभी पूरा नहीं कर पाए। घर में जो आपकी अहमियत है, वो किसी और की नहीं हो सकती।”

अंजलि ने प्यार से आर्यन के हाथ पर अपना हाथ रखा। “और मेरी हिम्मत तुम हो, आर्यन। जब तुम कॉलेज से लौटकर क्लिनिक आ जाते हो, तो मेरी आधी थकान तो वहीं मिट जाती है। अच्छा ये बताओ, अगले हफ्ते तुम्हारे कुछ एग्जाम्स भी तो थे ना? उनकी तैयारी कैसी चल रही है?”

बातों का सिलसिला अब आर्यन की पढ़ाई, उसके कॉलेज के नए दोस्तों और आने वाले सेमेस्टर की चुनौतियों की ओर मुड़ गया। अंजलि एक अनुभवी गाइड की तरह उसे सलाह दे रही थी—कभी करियर को लेकर, तो कभी जीवन के अनुशासन को लेकर।

“माँ, आप कभी-कभी बिल्कुल अपनी प्रोफेसर वाली टोन में आ जाती हैं,” आर्यन ने हँसते हुए कहा।

“क्या करूँ? डॉक्टर होने के साथ-साथ एक माँ भी तो हूँ। और एक माँ का काम कभी खत्म नहीं होता,” अंजलि ने चुटकी लेते हुए जवाब दिया।

वे इसी तरह छोटी-छोटी बातों में उलझे रहे—कभी खाने के मसालों पर चर्चा, तो कभी पुरानी यादों का ज़िक्र। गाड़ी अब उनकी कॉलोनी के गेट के अंदर दाखिल हो चुकी थी। सड़कों पर अब सन्नाटा था और सिर्फ उनके घर की खिड़कियों से आती मद्धम रोशनी दिखाई दे रही थी।

गाड़ी धीरे-धीरे उनके घर के पोर्टिको में आकर रुकी। इंजन बंद होते ही एक अजीब सी शांति छा गई, जिसमें सिर्फ उन दोनों की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

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